Wednesday, April 30, 2014

दीदार-ए-हकीक़त


तुमसे मिला,तुझे जाना , तुझे चाह भी बहोत
पर ख़ुशी के मायने सिर्फ यही तो नहीं होते


हम एकदूसरे से मिलने से पहले भी बहुत रोये
ये क्यूँ कहते हो की तुम न होते तो हम न रोते



जिंदगी सब कुछ खोती ही आ रही है अब तक 
ये मत कहो की तुम न होते तो कुछ न खोते


नींद मेरी पहले भी कोसों दूर थी आँखों से दोस्त
तुम ये क्यूँ कहते हो की तुम न होते तो हम सोते 



जो ये होता इल्म के इश्क आज भी हराम है मेरे दोस्त
तो हम दिल की बंजर जमीन पे इश्क का बीज न बोते

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