Wednesday, May 14, 2014

हुबहू ...



जिस मोड़ पे आये हैं उस मोड़ से जातेहै, कुछ सुस्त कदम रस्ते
कुछ तेज कदम राहे
पत्थर की हवेली को, शीशे के घरोंदो में, तिनको के नशेमन तक
इस मोड़ से जाते है...
आंधी की तरह
उड़कर, एक राह गुजरती है
शरमाती हुयी कोई,
क़दमों से उतरती है
इन रेशमी राहो में, एक राह तो वो होगी
तुम तक जो पहुचती है
इस मोड़ से जाते है..
एक दूर से आती है,पास आके पलटती है
एक राह अकेली सी,रुकती हैं ना चलती है
ये सोच के बैठी हूँ, एक राह तो वो होगी
तुम तक जो पहुचती है
इस मोड़ से जाते है.. ..!!


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