Monday, June 10, 2013

मैं पहाड़न ...!!

मैं पहाड़न
घास मेरी सहेली,पेड़ों से प्यार ।
मेरा वो बचपन,वो माटी का आँगन
भुलाऊँ कैसे !दादी की गुनगुन ?
कोंदों की रोटी,नमक संग खाऊँ
वो भी ना मिले,तो मैं भूखी सो जाऊँ ।
निराली पाठशाला ,मेरा तो बस्ता
घास का भारी पूला ,मेरी कलम
कुदाल औ दराती ,दिन भर भटकूँ
फिसलूँ गिरूँ,चोट खाके मुस्काऊँ
उफ़ ना करूँ
नंगे पाँव ही,चढ़नी है चढ़ाई,
आँसू को पोंछ,लड़नी है लड़ाई ।
सूने है खेत
वीरान खलिहान,भूखी गैया ने
खड़े किए हैं कान,पत्थर- सा कठोर
है भाग्य मेरा ,फूलों -से भी कोमल
है गीत मेरा ।
हुई बड़ी मैं.नजरों में गड़ी मैं
पलकें ना उठाऊँ ,खुद को छुपा
आँचल ना गिराऊँ,मेंहदी रचे
नाजुक गोरे हाथ,पराई हुई
बाबुल की गली ,हुई विदा मैं
बाबा गंगा नहाए,आँसू में भीगी
मेरी माँ दुखियारी ,तीज त्योहार
आए बुलाने भाई,भाई को देख
कितना हरषाई,दुखड़ा भूल
अखियाँ मुसकाई,एक पल में
बस एक पल में,बचपन जी आई ।

(नोट :- ये कविता मैंने कहीं पढ़ी थी तो डायरी में नोटेड थी आज पहाडो में आया तो सोचा लिख दूँ .)

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