Wednesday, June 5, 2013

धरती मेरी माता ..!!

पंछी दाने के लिए छोड़े पेड़ की छाँव दो रोटी के आड़ में छूटा अपना गाँव सात पीढी से भर रहे जो खेत सबका पेट बाँछे सब की खिल गई देख के बढ़ती रेट माया रूप है मोहिनी जिसने मन भरमाए पैसों की भूख में बच्चे माँ को बेच के खाए निश्चित है एक दिन सब रो रो के पछताएँगे गाँवों को पिछड़ा बताने वाले यहीं लौट के आएँगे जब भी वापिस लौटेंगे मेरे गाँव उन्हें अपनाएँगे सब मिलेगा यहाँ पे उनको पर माँ को ना पाएँगे

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