Friday, July 11, 2014

प्यार (एक प्राक्कल्पनात्मक अहसास )

 तुमसे प्यार के शारीरिक तौर-तरीकों,
की बात करते करते कल दोपहर फिर
जब मैं मुंबई जा रहा था रास्ते में अचनाक 
बारीश शुरू हो गयी,हालांकि मुझे उस से
कोई ख़ास सरोकार नहीं था,

फिर तुमने कहा की' न मैं बतियाती तुमसे
न तू यूँ दीवाना होता न इतनी बात होती
सच कहूँ सारा मेरा कसूर है,तुम हो बेगुनाह'
मुझे लगा मानो अब तक ये सब बेवजह था
अपराध था ये प्यार नहीं था ,

मैं तुझे समझ पाता,खुद को समझाता इतने में  
दिल ने मुझे आवाज दी के,शायद मैं भूल रहा हूँ
बात तो जीने की हुई थी,आपसी गम पीने की हुई थी
तुम क्यूँ अपराधी बनो भला,अगर ये अपराध है तो
ये सिर्फ तेरा ही इजहार नहीं था

मैंने भावावेश में आकर ,अपना सब-कुछ सा खोकर
कह दिया के ,चलो बन जाते हैं अजनबी फिर से हम
तुम जी कर देखो अपने नए जीवन को अपने ढंग से
मैं चाहूँगा तुम्हें देखना,अपने जीते जी ख़ुशी से मेरे बिन
कुछ ऐसे जैसे हमें प्यार नहीं था

तुमने झट से कहा की नहीं रह सकती मैं खुश तेरे बिन
मैं पहले थोड़ा सा घबराया,फिर एकदम से मुस्कुराया
खुश ही तो मैं रखना चाहता हूँ तुझे हर पल मेरी मुस्कान
किसी को खुश रखना और उस ख़ुशी को महसूस करने से
दो अजनबियों को इंकार नहीं था   


@akki
  




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