Monday, May 6, 2013

जीवन परिभाषा



पिछले दिनों माँ के पास बैठा था. मेरी उम्र २७ की हो गई है तो माँ ने स्वभाविक रूप से मुझसे एक सवाल किया की “छोरी देखूं तेरे खातिर ?
फिर मेरे जवाब का इन्तजार किये बैगेर या यूँ कहूँ उसे अनसुना करते हुए मुझे बताने लगी मेरी बुआ के लड़के हैं न वो प्रकाश भाईसाहब उनके दोस्त की बहन की बेटी है ,स्कूल में पढाती है टीचर है ,लम्बाई थोड़ी कम है पर घर के सारे काम जानती है ,मुझे अच्छी तो लगी पर मुझे ऐसे लड़की नहीं चाहिए जो पहले से टीचर है मैं तो ऐसी ढूंढ रही हूँ जो मेरे पास आके फिर टीचर बने .भले फिर स्कूल में पढाओ जा के घर के का काम क्या है मैं ही कर लुंगी ,थोडा तो वो भी कर ही सकती है |तू बोल क्या कहता है ?

मैं बड़े अनमने मन से इसे सुन रहा था,मैंने लड़की के सारे विशेषणों को किनारे रखते हुए,और कमियों को नजरअंदाज करते हुए शादी के महत्त्व पे सवाल खड़ा कर दिया ..मैंने माँ से पुछा की कोई और विकल्प नहीं है जीने का ? क्या शादी जरुरी है ? तू क्यूँ किसी अनजान लड़की को मेरे तुम्हारे जीवन में लाना चाहती है? छोड़ न मैया मुझे नहीं करनी शादी वादी , मुझे अकेले ही अपने ढंग से जीवन जीना है |

इतना सुनना था की माँ ने मेरी बातों को उटपटांग बता दिया और बोली ... यही जीवन है ,घर तो बसा के जाउंगी तेरा अकेला रहेगा तो कौन करेगा तेरी देखभाल अभी तो मैं हूँ मेरे हाथ पाँव सलामत है पर कितने दिन ,बाबा भी अब कमजोर होने लगे हैं जब से उनकी तबियत बिगड़ी है , उनके सामने ऐसी बात मत कर देना उन्हें तकलीफ होगी. तुझे दिक्कत क्या है शादी से, वंश आगे कैसे बढ़ेगा ..अच्छी लड़की मिल जायेगी हर कोई तेरी सुधा भाभी जैसी नहीं होती..समझा ? ये जो टीचर लड़की है न वैसे अच्छी है बस मुझे लम्बाई में थोडा लगता है ५.३ तो होगी, मेरे जितनी है तुझे अगर दिक्कत नहीं हो तो मैं बात करती हूँ ,तू देख आ लड़की को, बोल ? अच्छे घर की लड़की है बिना बाप की है गरीब भी है हमें कुछ नहीं चाहिए वैसे भी एक साडी के साथ ही लाऊंगी बहु को,तू बोलेगा  तो घोड़ी,बजा और रिसेप्सन भी नहीं करेंगे .लड़की वालो को मैं मना लुंगी. बोल ?

मुझे अब घबराहट होने लगी थी तो मैंने वहाँ से उठने में ही भलाई समझी ,मैंने कहा ठीक है तू कर तेरेको जो करना है,मैं तो इस दुनिया में ही तेरे मर्ज़ी से आया हूँ हक है तेरा पूरा ,बस इतना सुन ले की मेरे पास एक ही जीवन है जिसे मैं गृहस्थी के ढर्रे पे कुर्बान नहीं करना चाहता | इसके बावजूद भी तू अगर यह चाहती है तो देख ले तेरे हिसाब से .. मैं खेत जाता हूँ ,रात को देर से आऊंगा खाना बाबा के साथ खा लियो तुम.

जब सब मुझे ये पूछते हैं की मैं शादी क्यूँ नहीं करना चाहता तो मेरा जवाब एक सवाल होता है एक सवाल जो यदा कदा जेहन में आ ही जाता है की क्या वाकई इंसान के लिए यही एक तरीका उचित है जीने के लिए के पढ़ो लिखो,शादी करो ,बच्चे करो बच्चों को पालो पढाओ लिखाओ ,बड़ा करो, शादी करो, नाती दोहितों को के साथ समय गुजारो राम रहीम का नाम लो और बूढ़े हो जाओ हुए खांसने लगो,जब तक मौत की हिचकी न आ जाये ..खांसते रहो और जीवन की ढर्रे पे नैया को हांकते रहो ? क्या वाकई बस यही है जीवन की परिभाषा ?

अगर हाँ तो कितना व्यर्थ है जीवन जहाँ में , आखिर इतना कष्ट ,इतनी पीड़ा सहके जनम लो ,फिर तरह तरह के गम और दुःख सह के जहाँ में जियो किसलिए जनम के मरने के लिए ?नहीं ये तार्किक नहीं लगता ये इतने छोटे उद्देश्य के लिए विधाता ने  मानव रुपी इतनी जटिल सरंचना का निर्माण नहीं किया होगा ,कोई तो राज,रहस्य होगा इस जीवन का ?आखिर क्यूँ ये दुनिया अस्तित्व में आई ,बनके के उजड़ने के लिए ?

हम जब कभी थोडा रूककर अपने चारो तरफ देखोगे तो हर किसी को एक जैसे ढर्रे पे चलता हुआ पाओगे. ये जानते हुए की इस ढर्रे पे चलते चलते ये जीवन खतम हो जाना है.हम क्यूँ ऐसे कुए का मेढंक बनना पसंद करते हैं जिससे बाहर हम घुसने के बाद निकल ही नहीं पाएंगे.क्या सिर्फ इसलिए की उस कुए में थोडा पानी है अरे पानी के लिए तो समंदर है ,तालाब है,माना थोड़े असुरक्षित हैं उनका पानी थोडा गन्दा और कड़वा है पर आज़ादी तो होगी बाहर की खुली हवा खाने की ,एक अँधेरे कुए में घुट घुट के तो नहीं मरेंगे..

वंश चलाने के लिए दुनिया में करोडो बच्चे अनाथ हैं एक दो को गोद लेके भी वंश चल सकता है  वंश के लिए शादी कर के व्यर्थ जीवन गंवाना मुझे गंवारा नहीं मैं लगा हूँ अपने जीवन की परिभाषा अपने हाथों लिखने में ..जिस दिन समझने लायक हो गई ..सबको बताऊंगा की ..बाकी विधाता सब जानता है ,जो करेगा अच्छा ही होगा ..!!






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