चंडीगढ़ का नाम सुनते ही देश दुनिया की थोड़ी खबर रखने वाले लोगो के मुह से अनायास ही निकल पड़ता है ,वाह ! शहर हो तो ऐसा.
वाकई ये शहर अलग है ,यहाँ साफ़ सुथरी सड़के हैं ,कोई गन्दा नाला नहीं है,पानी निकासी की व्यवस्था ऐसी की बदल फटने पे भी आधा घंटे में पूरा पानी सडको से साफ़ हो जाये. पूर्व नियोजित ढंग से सेक्टर वाईज़ बसाया हुआ शहर .यहाँ के बंगले देखो तो दंग रह जाओ ,हर बंगले के आगे हरा भरा बगीचा,चमचमाती महँगी महँगी कारें ,महंगे विलायती कुत्ते ,सुरक्षा में जवान आदि आदि ..पूरा एक मायाजाल है जो किसी भी संतोषी जीव के मन में अपने हाल की स्थिति के बारे में असंतोष पैदा कर दे.
यहाँ की जीवन शैली भी बड़ी अजीब है (गाँव वालो के लिए पूरी फिल्मी ) सुबह १० बजे घर से महँगी गाडी में बैठ के निकलना ,२ करोड के खरीदे हुए शोरूम में जा के बैठना ,भले उसमे कमाई हो न हो ..पर सोसाबाजी पूरी होती है ..शोरूम में एयर कंडीसन लगाया ,दो कर्मचारी रखे ,दोपहर में पिज्जा खाया ,जैसे तैसे शाम के ६ बजाते हैं ,और फिर जैसे ही ६ बजे दूकान बंद ,और शाम के स्वागत की तैयारी..घर पे गए शावर लिया..इत्र वित्र छिड़का ... शामके मूड के हिसाब से गाडी निकाली ..और निकल पड़े ... किसी पब,बार,डिस्को,के लिए ..देर रात तक पार्टी शार्टी की..और घर आ के सो गए ..इसको नाम दिया "यारां दा टशन ".
मेरे एक मित्र ने मुझे शाम की पार्टी में निमंत्रित किया ,ये मेरे लिए पहला मौका था,तो मुझे मालूम नहीं था की पार्टी दरअसल कहते किसको हैं ,मैं जींस पे कुरता डाल के चला गया,जो पता बताया था वहाँ आधा घंटे तक तलाशने के बाद मैं पहुंचा. वो एक ठेठ विलायती तरीके का डिस्को क्लब था ,बाहर दो बाहुबली खड़े थे बोले 'पास प्लीज़' आधा मिनट तक उनकी बात का मतलब समझते हुए मैंने जेब से मोबाइल निकाला और मित्र को फोन किया..वो अंदर अँधेरी सी सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हुए आया और मुझे अंदर ले के गया ..
जब अंदर पहुंचे तो वहाँ की छटा देख के मन घबराने लगा .. इतना शोर शराबा ,हायो रब्बा हो रहा था ..मित्र मेरे साथ खड़ा था कुछ सुनने की गुंजाइश नहीं थी तो बस बार बार मेरी तरफ देख के मुशकुरा रहा था ..और मैं फटी आंखो से तथाकथित आधुनिक समाज के जवान लोगो को देख रहा था जिनमे लड़के और लड़कियां दोनों थी . कुछ काकी ,फूफी भी लग रही थी.
करीब १० मिनट तक सब देखने और सहने के बाद मेरा सब्र टूट गया मैंने मित्र से जरा बाहर आने का इशारा किया , बाहर आते ही मैंने उससे जाने की आज्ञा मांगी ..तो मुझे हिकारत की नजर से देखने लगा बोला " अबे हमेसा गंवार ही रहेगा क्या , जिंदगी के मजे कब लेगा ?" ये सवाल मेरे लिए महत्वपूर्ण था और मैं उसका जवाब दे भी सकता था ,पर फिलहाल मैंने वहाँ से जाने में ही भलाई समझी,सो चला आया .
बाहर आने पे मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की मानो कुम्भीपाक नरक से सीधे निकल के आ रहा हूँ.. आखिर कैसे जीते हैं ये लोग ऐसे माहोल में..अपने मन के सन्नाटे को मिटाने के लिए ये लोग डिस्को में तेज आवाज पे नाचते हैं,लेकिन मन का सन्नाटा ,बाहरी आवाज से कैसे मिटेगा ? जिस नशे में चूर ये लोग नाचा गा रहे हैं वो तो कुछ देर का है उसके उतारते ही फिर वो ही सन्नाटा इन्हें घेर लेगा .. !
ऐसे विकसित शहर की जवान पीढ़ी इस तरह अपनी जवानी जाया कर रही है देख के दुःख हुआ ..क्या ये है वो विकाश और उसका पैमाना जिसके लिए पूरा भारत और उसकी हर आने वाली सरकार वादे कर कर के सब्जबाग दिखा रही है ? अगर इसी को विकाश कहते हैं तो फिर इससे तो अच्छा हम जंगली ही ठीक थे ,कम से कम जंगली तो थे ..!!
वाकई ये शहर अलग है ,यहाँ साफ़ सुथरी सड़के हैं ,कोई गन्दा नाला नहीं है,पानी निकासी की व्यवस्था ऐसी की बदल फटने पे भी आधा घंटे में पूरा पानी सडको से साफ़ हो जाये. पूर्व नियोजित ढंग से सेक्टर वाईज़ बसाया हुआ शहर .यहाँ के बंगले देखो तो दंग रह जाओ ,हर बंगले के आगे हरा भरा बगीचा,चमचमाती महँगी महँगी कारें ,महंगे विलायती कुत्ते ,सुरक्षा में जवान आदि आदि ..पूरा एक मायाजाल है जो किसी भी संतोषी जीव के मन में अपने हाल की स्थिति के बारे में असंतोष पैदा कर दे.
यहाँ की जीवन शैली भी बड़ी अजीब है (गाँव वालो के लिए पूरी फिल्मी ) सुबह १० बजे घर से महँगी गाडी में बैठ के निकलना ,२ करोड के खरीदे हुए शोरूम में जा के बैठना ,भले उसमे कमाई हो न हो ..पर सोसाबाजी पूरी होती है ..शोरूम में एयर कंडीसन लगाया ,दो कर्मचारी रखे ,दोपहर में पिज्जा खाया ,जैसे तैसे शाम के ६ बजाते हैं ,और फिर जैसे ही ६ बजे दूकान बंद ,और शाम के स्वागत की तैयारी..घर पे गए शावर लिया..इत्र वित्र छिड़का ... शामके मूड के हिसाब से गाडी निकाली ..और निकल पड़े ... किसी पब,बार,डिस्को,के लिए ..देर रात तक पार्टी शार्टी की..और घर आ के सो गए ..इसको नाम दिया "यारां दा टशन ".
मेरे एक मित्र ने मुझे शाम की पार्टी में निमंत्रित किया ,ये मेरे लिए पहला मौका था,तो मुझे मालूम नहीं था की पार्टी दरअसल कहते किसको हैं ,मैं जींस पे कुरता डाल के चला गया,जो पता बताया था वहाँ आधा घंटे तक तलाशने के बाद मैं पहुंचा. वो एक ठेठ विलायती तरीके का डिस्को क्लब था ,बाहर दो बाहुबली खड़े थे बोले 'पास प्लीज़' आधा मिनट तक उनकी बात का मतलब समझते हुए मैंने जेब से मोबाइल निकाला और मित्र को फोन किया..वो अंदर अँधेरी सी सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हुए आया और मुझे अंदर ले के गया ..
जब अंदर पहुंचे तो वहाँ की छटा देख के मन घबराने लगा .. इतना शोर शराबा ,हायो रब्बा हो रहा था ..मित्र मेरे साथ खड़ा था कुछ सुनने की गुंजाइश नहीं थी तो बस बार बार मेरी तरफ देख के मुशकुरा रहा था ..और मैं फटी आंखो से तथाकथित आधुनिक समाज के जवान लोगो को देख रहा था जिनमे लड़के और लड़कियां दोनों थी . कुछ काकी ,फूफी भी लग रही थी.
करीब १० मिनट तक सब देखने और सहने के बाद मेरा सब्र टूट गया मैंने मित्र से जरा बाहर आने का इशारा किया , बाहर आते ही मैंने उससे जाने की आज्ञा मांगी ..तो मुझे हिकारत की नजर से देखने लगा बोला " अबे हमेसा गंवार ही रहेगा क्या , जिंदगी के मजे कब लेगा ?" ये सवाल मेरे लिए महत्वपूर्ण था और मैं उसका जवाब दे भी सकता था ,पर फिलहाल मैंने वहाँ से जाने में ही भलाई समझी,सो चला आया .
बाहर आने पे मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की मानो कुम्भीपाक नरक से सीधे निकल के आ रहा हूँ.. आखिर कैसे जीते हैं ये लोग ऐसे माहोल में..अपने मन के सन्नाटे को मिटाने के लिए ये लोग डिस्को में तेज आवाज पे नाचते हैं,लेकिन मन का सन्नाटा ,बाहरी आवाज से कैसे मिटेगा ? जिस नशे में चूर ये लोग नाचा गा रहे हैं वो तो कुछ देर का है उसके उतारते ही फिर वो ही सन्नाटा इन्हें घेर लेगा .. !
ऐसे विकसित शहर की जवान पीढ़ी इस तरह अपनी जवानी जाया कर रही है देख के दुःख हुआ ..क्या ये है वो विकाश और उसका पैमाना जिसके लिए पूरा भारत और उसकी हर आने वाली सरकार वादे कर कर के सब्जबाग दिखा रही है ? अगर इसी को विकाश कहते हैं तो फिर इससे तो अच्छा हम जंगली ही ठीक थे ,कम से कम जंगली तो थे ..!!
No comments:
Post a Comment