वैकल्पिक मीडिया यानी सोशल मीडिया यानी ट्वीटर,फेसबुक,वाट्सएप,लाइन
,आदि आदि ...ये आधुनिक दुनिया के वो ओजार हैं जिनमें किसी भी तंत्र को
बनाने या मिटाने की काबिलियत है .. ये ठीक किसी लोहार के हथोडे की तरह है जिससे
गरम लोहे को पीट के तलवार भी बनाई जाती है नाली साफ़ करने की खुरपी भी.मैं उस पीढ़ी
का युवा हूँ जिसने जेपी का आंदोलन तो नहीं देखा लेकिन जेपी के आंदोलन से निकले ऐसे
राजनेताओ का राज देखा है जिनकी करतूतों से लोकतंत्र शब्द से लोगो का भरोसा भंग
होने लगा (खासकर युवा वर्ग का ) और २१वि सदी के प्रारंभ से पूर्व ऐसी राजनीती से
त्रस्त देश के अलग अलग हिस्सों में लोग अपने स्तर पे उनकी आलोचना करते पाए जाते थे,
लेकिन ऐसी अधिकांस बातें उन् लोगो तक पहुँच नहीं पाती थी ,सिर्फ
वो ही बातें अखबारों या टीवी के माध्यम से आगे जाती जो टीवी या अखबार के संपादक को
उचित लगती.और मुझे ये कहते जरा भी हिचक नहीं है की संपादको के लिए इमानदारी से
संपादन करना इतना आसान नहीं था ..क्यूँ के बाजारवादी अर्थव्यवस्था में अर्थ
महत्वपूरण है न की व्यवस्था.
इन्टरनेट की मूल अवधारणा आज़ादी है ..लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का अधिकार है और जब लाखो करोडो लोग किसी मुद्दे पे लिखित में बातें कानो में पड़े और आँखों से दिखे तो रहबरों के माथे पे पसीना तो आना लाज़मी है (क्यूँ के मिश्र की क्रांति हाल ही में पुरे विश्व ने देखि है जिसका छोटा रूप अन्ना और उनके साथियों ने भी दिखाया) और इस उद्देश्य को पूरा
करने के लिए सोशल मीडिया ज्यादा उपयोगी साबित होता है,क्यूँ के
यहाँ किसी तरह की कोई बंधिस नहीं है कोई भी अपना अकाउंट बना के देश के किसी भी
मुद्दे पे अपनी बात रख सकता है और देश के प्रधानमंत्री तक को अपनी बात पहुंचा सकता
है. ये बात अलग है की यहाँ भी बहुमत से ही मुद्दे ट्रेंड करते हैं. सरकार के
द्वारा चलाई गई किसी भी योजना के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगो तक सुचना पहुंचाई
जा सकती है.
२१वि सदी से के प्रारंभ से पहले जहाँ इन योजनाओ
और कार्यक्रमों पे अपनी राय देना कुछ चुनिन्दा बुद्धिजीवी लोगो का ही काम था लेकिन
अब ऐसा नहीं है अब किसी भी सरकारी निर्णय पे देश के करोडो लोग अपनी राय देते हैं
और जिसका असर भी होता है दागी सांसदों पे सरकारी अध्यादेश का राहुल गांधी द्वारा
विरोध और सरकार का उसे वापस लेना इसका ताज़ा उदहारण है, वरना तो
जब सोशल मीडिया नहीं थी तो NDA सरकार द्वारा ऐसा ही एक अध्यादेश
राष्ट्रपति कलाम के विरोध के बावजूद पास करा दिया गया,जिसका एक
कारन था मीडिया का जनता की आवाज को दबा के रखने में सरकार का सहयोग करना (लोभ या
दबाव के करानवश ) अब इसमें कोई ये भी कह सकता है की ये अध्यादेश तो इसलिए वापस हुआ
क्यूँ के टीवी और अखबार में इसे लेकर खूब चर्चाएँ हुई , हाँ ये
सच है की टीवी और अखबारो ने इस विरोध को महत्त्व से दिखाया लेकिन उन्हें ये विरोध
दिखाने के लिए मजबूर होना पडा कारन था वैकल्पिक मीडिया पे हो रहा भारी विरोध और
टिका टिपण्णी ...क्यूँ के हर समाचार पत्र और न्यूज चैनल सोशल मीडिया में सक्रीय है
और सोशल मीडिया पे हो रहे विरोध को नजरंदाज करना उनके वश में नहीं था .. सही
शब्दों में कहूँ तो टीवी और अखबार दोनों सही मायने में समाज का दर्पण सोशल मीडिया
के आने के बाद ही बना है अन्यथा तो ये सब संपादको के ईमान पे चलता था .
किसी भी लोकतंत्र को मजबूत करने में इसके चौथे
स्तंभ यानी मीडिया का अति महत्वपूर्ण स्थान होता है और मीडिया को मजबूत करने में
सोशल मीडिया का महत्वपूर्ण स्थान है ..NDTV के
पत्रकार रवीश कुमार की सोशल मीडिया के बारे में कही एक बात बहुत महत्त्व की है की
"मानव इतिहास में लोगो की अभिव्यक्तियो का इतना बड़ा लिखित डाटाबेस आज से
पहले कभी नहीं बना " और ये वाकई अपने आप में मानव की एक महान उपलब्धि है. अब
कोई भी नेता बिना सर पैर के तथ्य देके लोगो को भ्रमित नहीं कर सकता क्यूँ के १५
करोड लोग ऐसे हैं जिनके पास गूगल नाम का अतिविशिष्ट हथियार है जिसपे एक सेकण्ड में
उन् तथ्यों को सत्यापित किया जा सकता है .. इससे जिम्मेदार पदों पे बैठे लोगो पे
दबाव तो बनता ही है की वो कुछ ऐसा न कह दें की बाद में जवाब देना भारी पड जाये .और
जिस तरह से इन्टरनेट की पहुँच लोगो तक बढ़ रही है ये दबाव भी बढ़ता ही जा रहा है .
अमेरिकी लोकतंत्र के बारे में कहा जाता है की वहाँ लोगो की भावनाओं के खिलाफ कोई
भी कदम सरकार नहीं उठा सकती कारन है ९०% से अधिक लोगो का इन्टरनेट और सोशल मीडिया
पे सक्रीय होना .
(पिछले साल अन्ना आन्दोलन के दौरान मैंने एक शब्द बार बार सुना वो है
"स्वराज" इस शब्द के इससे पहले मेरे लिए जो मायने थे वो अरविन्द
केजरीवाल की लिखित पुस्तक स्वराज और गांधी की हिंद स्वराज (जो मैंने स्वराज को
पढ़ने के बाद पढ़ी )पढ़ने के बाद एकदम से बदल गए ..पहले जहाँ मैं अंग्रेजो को भगा
के खुद के लोगो के राज को स्वराज समझता था क्यूँ के बाल गंगाधर तिलक ने जो नारा
दिया था उसके यही मायने हमें स्कूल और कोलेज में पढाये गए थे लेकिन ये दोनों
पुस्तकें पढ़ने के बाद मुझे समझ आया की सही मायने में स्वराज तो अभी आया ही
नहीं...)
देश में स्वराज स्थापित करने में सोशल मीडिया
एक महत्वपूरण भूमिका अदा कर सकता है बल्कि कर रहा है .. स्वराज की मूल अवधारणा है
किसी भी निर्णय पे पहुँचने से पूर्व अधिक से अधिक लोगो की आम राय लेना.. और ये काम
सोशल मीडिया बखूबी कर रहा है समय के साथ जैसे जैसे सोशल मीडिया की पहुँच बढ़ेगी और
"स्वराज" जो की सही मायनो में लोकतंत्र है स्थापित होता जायेगा .इसलिए मेरी
राय में सरकार को और सामाजिक संगठनों को प्रयास करना चाहिए की अधिक से अधिक लोगो
तक इन्टरनेट की पहुँच हो और वो इनका इस्तेमाल सीखे ताकि लोकतंत्र को मजबूत करने
में वो अपना सक्रीय योगदान दे सकें.
इस सकारात्मक टिपण्णी के बाद मैं इन्टरनेट/सोशल
मीडिया के नकारात्मक पहलु पे भी कहना
चाहूँगा क्यूँ के जैसा मैंने कहाँ ये लोहार के हथोडे की तरह है तो इसका जो
सकारात्मक पहलु है उसको मैंने नाली साफ करने वाली खुरपी कहा कहा है ...पर इसका
नकारात्मक पहलु भी है यानी ये लोहार का हथोड़ा तलवार भी बना सकता है जिससे अराजकता
फ़ैल सकती है ... लेकिन हमें इससे भयभीत हो के हथोडे पे ही प्रतिबन्ध लगाने के
बारे में नहीं सोचना चाहिए. इसके और भी उपाय किये जा सकते हैं. पिछले दिनों मैं
अपने एक हैकर मित्र से इस सम्बन्ध में चर्चा कर रहा था तो उसने इन्टरनेट के
दुरुपयोग को रोकने के लिए एक उपाय सुझाया " सोशल मीडिया पुलिस " जिस तरह
असल दुनिया में असामाजिक तत्वों पे पोलिस नजर रखती है वैसे ही ये काम सोशल मीडिया
में भी संभव है जरुरत है कुछ सोशल मीडिया के पोलिस ठाणे बनाने ली जो इन्टरनेट पे
गस्त करेंगे और जो कोई भी असामाजिक बात (जो संविधान सम्मत न हो न की सरकार सन्मत )
करता पाया जायेगा उसे IP ADDRESS OR MAC (Media Access Control) address को
ट्रैक करके उसके कम्पूटर या मोबाइल को जब्त करने और उस पर स्थानीय पोलिस के सहयोग
से कार्यवाही की जा सकती है . हो सकता है ये थोडा खर्चीला हो मुश्किल काम हो लेकिन
इससे दुरुपयोग करने वालो में भय तो व्याप्त होगा ही.
कुल मिलाकर के यही कहा जा सकता है की सोशल
मीडिया या वैकल्पिक मीडिया मुख्यधारा की मीडिया पे दबाव बनाके लोकतंत्र को मजबूत
करने का एक शसक्त माध्यम है इसमें कोई शक नहीं है .
सिमित समझ का लेखक
AKHIL_RAJ
1 comment:
कब देश के ९०% लोगो के हाथ आएगा ये ?
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