भगवान ने शरिर एक ही दिया है ,पर शायद मन दो दिए हैं ,जो आपस में उलझते रहते हैं -
बाहरी मन --
माना अभी तक कुछ किया नहीं,माना कुछ कर के दिखाया नहीं, कोई पुरष्कार नहीं जीता ,कोई प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया,किसी मंच से बोला नहीं..लेकिन यार फिर भी मैं कुछ हूँ !!
मैं कुछ हूँ क्यूँ के मैं हर उस बात को गहराई से समझता हूँ ,सुनता हूँ,पढता हूँ जिसपे दुनिया वाह वाह कह उठती है ..जिसका सब गुणगान करते हैं ... मुझे भी समझ है उन् मुद्दो की जिनपे बतियाने वालो को बुद्धिजीवी कहा जाता है ..तो क्या हुआ मेरी प्रतिक्रिया थोड़ी देर से आती है तो क्या हुआ जो मेरे जैसी प्रतिक्रिया पहले कोई दे चूका होता है ..कहा तो मैंने भी है न कुछ ..??
कितने लोग है ऐसे जो मेरे जैसी समझ रखते हैं ,तो क्या हुआ उनकी संख्या ज्यादा है भीड़ का हिस्सा तो नहीं हूँ न .. कम से कम किसी समूह में तो आता हूँ ..और देखना एक दिन ये समूह छोटे से छोटा होता जायेगा और मैं एक दिन चुनिन्दा लोगो में गिना जाऊंगा ..
भीतरी मन ---
हा हा हा (अट्ठाहस )नहीं ये तो कामना हुई ..मेरी कोई कामना नहीं है .क्यूँ करूँ कामना जब मुझे पता है ये किसी की पूरी नहीं होती ..किसी और को पता हो न हो मुझे पता होना चाहिए मैं क्या हूँ ..क्या रखा है दिखावे में सब तो क्षणभंगुर है ..एक दिन सब छूट जाना है फिर किस बात की कामना ...कोई समझे न समझे तू समझ की तू क्या है ..बैठ शांति से कहीं पे दुनिया को भूल के और तलास खुद को ..जिस दिन खुद को तलाश लेगा तू जानेगा की तू किसी समूह का हिस्सा नहीं है बल्कि तू अपने आप में अद्वितीय है .. हमेशा से ..!!
दो मनो में चलने वाला ये द्वन्द पुराना है पर बरक़रार है पता नहीं कब ये बंद होगा ..किसे जितना चाहिए और कौन जीतेगा ?
बाहरी मन --
माना अभी तक कुछ किया नहीं,माना कुछ कर के दिखाया नहीं, कोई पुरष्कार नहीं जीता ,कोई प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया,किसी मंच से बोला नहीं..लेकिन यार फिर भी मैं कुछ हूँ !!
मैं कुछ हूँ क्यूँ के मैं हर उस बात को गहराई से समझता हूँ ,सुनता हूँ,पढता हूँ जिसपे दुनिया वाह वाह कह उठती है ..जिसका सब गुणगान करते हैं ... मुझे भी समझ है उन् मुद्दो की जिनपे बतियाने वालो को बुद्धिजीवी कहा जाता है ..तो क्या हुआ मेरी प्रतिक्रिया थोड़ी देर से आती है तो क्या हुआ जो मेरे जैसी प्रतिक्रिया पहले कोई दे चूका होता है ..कहा तो मैंने भी है न कुछ ..??
कितने लोग है ऐसे जो मेरे जैसी समझ रखते हैं ,तो क्या हुआ उनकी संख्या ज्यादा है भीड़ का हिस्सा तो नहीं हूँ न .. कम से कम किसी समूह में तो आता हूँ ..और देखना एक दिन ये समूह छोटे से छोटा होता जायेगा और मैं एक दिन चुनिन्दा लोगो में गिना जाऊंगा ..
भीतरी मन ---
हा हा हा (अट्ठाहस )नहीं ये तो कामना हुई ..मेरी कोई कामना नहीं है .क्यूँ करूँ कामना जब मुझे पता है ये किसी की पूरी नहीं होती ..किसी और को पता हो न हो मुझे पता होना चाहिए मैं क्या हूँ ..क्या रखा है दिखावे में सब तो क्षणभंगुर है ..एक दिन सब छूट जाना है फिर किस बात की कामना ...कोई समझे न समझे तू समझ की तू क्या है ..बैठ शांति से कहीं पे दुनिया को भूल के और तलास खुद को ..जिस दिन खुद को तलाश लेगा तू जानेगा की तू किसी समूह का हिस्सा नहीं है बल्कि तू अपने आप में अद्वितीय है .. हमेशा से ..!!
दो मनो में चलने वाला ये द्वन्द पुराना है पर बरक़रार है पता नहीं कब ये बंद होगा ..किसे जितना चाहिए और कौन जीतेगा ?
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